श्री योगानंद सरस्वती (गांडा महाराज)

जन्म: तालनगुर (सुरत जवळ, गुजरात) १८६९ मध्ये अंविल ब्राम्हण कुळात
कार्यकाळ: सन १८६९-१९३८ 
वडील: डाह्याभाई  
गुरु: श्री वासुदेवानंद सरस्वती  
शिष्य: श्री समर्थ चिंतामणी महाराज 
समाधी: सन १९३८, श्रीक्षेत्र गुंज येथे 

श्री योगानंद सरस्वती (गांडा महाराज)
श्री योगानंद सरस्वती (गांडा महाराज)

श्री योगानंद सरस्वती स्वामी महाराजांचं जन्म परम पवित्र अंविल ब्राम्हण कुळात सुरत जवळ (गुजरात) तालान्नपूर गावी झाला. त्यांच्या पिताश्रींचे नाव  डाह्याभाई. बालपणी त्यांचे जीवन अत्यंत सामान्य असेच होते पण  प. पु. वासुदेवानंद सरस्वतीचे  संपर्कात आले व जीवन आमूलाग्र बदलले. श्री टेम्बे स्वामींचा अनुग्रह झाला व ते टेम्बे स्वामींचे निष्ठावान शिष्य झाले. प. प. रंगअवधुत स्वामी महाराज तर म्हणत श्री योगानंद सारस्वतींसारखा शिष्य होणे नाही. श्री वासुदेवानंद सरस्वती स्वामी महाराजांचे आचरण अत्यंत कठोर व शीस्तबद्ध तरीही योगानंद सरस्वतीच्या निष्ठा, श्रद्धा व आचरण यामुळे ते स्वामींचे एक अत्यंतजवळचे अंतरंग शिष्य म्हणून ओळखले जाऊ लागले. त्यांचे निस्पृह आचरण व श्रीगुरुचे चरणी समर्पण यामुळे अनेक मुमुक्षु भक्त त्यांच्याकडे आकर्षित झाले व ते त्यांचे निस्सीम भक्त झाले. श्री टेम्बे स्वामी महाराजांचाही त्यांना खूप सहवास लाभला.

पवनी  येथील चातुर्मासात ते स्वामीबरोबरच होते. त्यांचे मूळ नाव कल्याण. पण त्यांच्या विदेही अवस्थेतील अध्यात्मिक दशेने लोकांना ते वेडेच वाटत (गुजराथी भाषेत याला गांडा म्हणतात) पण वृत्तीतून ते ब्रह्मनंदी  निमग्न असत. प. प. योगानंद सरस्वतींनी प. पु. टेम्बे स्वामी महाराजांचे "गुरुमुर्ती  चरित्र" या नावाने मराठीत चरित्र लिहिले आहे. काही काळ ते भरुच मध्ये राहिले नंतर भारतात अनेक ठिकाणी भ्रमण केले परंतु अंततः ते गुरु आज्ञेनुसार गोदावरी तटावरील श्री क्षेत्र गुंज येथे स्थिरावले.

श्री क्षेत्र गुंज शिव मंदिर, दत्त मंदिर व इतर निवास व्यवस्था व भोजन प्रसाद व्यवस्था संस्थ।न मार्फत आहे. हे सर्व भव्य दिव्य मंदीर व परिसर विकासाचे कार्य त्यांचे परमशिष्य समर्थ चिंतामणी महाराज यांनी केले. या मंदिर ट्रस्ट मार्फत अनेक सामाजिक व कल्याणकारी प्रकल्प राबवले जातात. हे संस्थान अत्यंत उत्तम पद्धतीने सर्व कार्यक्रम करते. मंदिर परिसर हा अत्यंत पवित्र ठेवलेला आहे.

श्री योगानंद सरस्वती स्वामी महाराजांनी १९३८ मध्ये आपला देह दत्त चरणी विलीन केला. महाराजांची समाधी या मंदीर परिसरातच आहे.

फाल्गुन व्दादशी परमहंस परमपुज्य पारिव्राजकाचार्य सद्गुरू श्री योगानंद सरस्वती स्वामी महाराज तथा श्री गांडा महाराज श्री क्षेत्र गुंज जि. परभणी ह्यांची पुण्यतिथी आहे. गुंज हे गांव पाथरीजवळ गोदावरी तटावर वसलेले छोटेसे गाव पण आज प्रत्येकाच्या तोंडी गुंज चे नांव ऐकावयास येते. अशा थोर महात्म्याचा जन्म तालनगुर (सुरत जवळ) गुजराथ मध्ये १८६९ मध्ये झाला. अध्यात्मात विदेही अवस्थेत ते पोहोचलेले महात्मा होते गुजराथी भाषेत अशा अवस्थेला गांडा म्हणुन संबोधतात. त्यांचे गुरू परमहंस परमपुज्य पारिव्राजकाचार्य सद्गुरू श्री वासुदेवानंद सरस्वती उर्फ टेंबे स्वामी होत.  नारेश्वरचे श्री रंगावधूत स्वामी हे त्यांचे गुरुबंधू होत. गांडा महाराजांना टेंबे स्वामींचा भरपूर सहवास लाभला. पवनी येथील चातुर्मासात टेंबे स्वामींसोबत गांडा महाराज असायचे. त्यांनी भरपूर भ्रमण केले तरी पण टेंबे स्वामीच्या आज्ञेनुसार ते श्री क्षेत्र गुंज ला स्थिरावले. १९३८ साली त्यांनी त्यांचा देह दत्तचरणी लिन केला. अशा थोर महात्म्यास कोटी कोटी प्रणाम. एकदम गोदातटेच्या व एकांतात गुंजचे स्वामी समाधी मंदीर आहे. मानवतररोड स्टेशन  हुन ३० कि. मी., व परभणीहुन ६० कि. मी. अंतरावर आहे.

गुंज येथील दत्त मूर्ती
गुंज येथील दत्त मूर्ती

पू. श्री गांडा महाराज (श्री योगानंद सरस्वती) 

पू. श्री की जन्म गुजरात के सुरत जिले में बसे तलंगपुर गाँव में वि. सं. १९२५ मार्गशीर्ष माह में पूर्णिमा की रात्रि को हुआ। बचपन में शरारतभरी प्रवृति ज्यादा होनेके कारण लोग उन्हे 'गांडा' नाम से बुलाते। मूल नाम कल्याणभाई । आठ वर्ष की वय में उनका विवाह हुआ किन्तु बचपन से वैराग्य वृत्ति के कारन वे योगीजनों व साधु की शोध करते। सद्गुरु प्राप्ति हेतु पू. श्रीने धरमपुरी के घाट पर, ॐकारजी, कीटीघाट, नीमावर में अनुष्ठान किये। करुणामूर्ति टेंबे स्वामी महाराज के शरण मे जाने की प्रेरणा उनको सुब्रहम्ण्म स्वामी, केशव भट्ट व शाम भट्ट से मिली. बापुरावमुनि के साथ वो मंडलेश्वर गये वहां से चिखलदा गये किंन्तु सद्गुरु के दर्शन उनको सिनोर में मार्कंडेश्वर महादेव मे हुए। निकोरा में गांडा महाराज की श्रद्धा-भक्ति व शरणागत भाव से प्रसन्न होकर टेंबे स्वामी महाराजने प्राणायाम की शिक्षा दी और योगाभ्यास में अग्रेसर कीया । शुक्लतीर्थ में अपने मात-पिता की आज्ञा व पत्नी की अनुमति लेने हेतु समझाते हुए चातुर्मास्य मे द्वारिका आनेका कहा। यहां उनको स्वामी महाराज कृष्णावतार ही है व गुरु-वचन अनुसार चलने पर असंभव कार्य भी संभव व सरल बनते है उसका प्रमाण दिया। भरूच में भागलकोट के तट पर रह कर उन्होने अपने गुरु परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमद् वासुदेवानंद सरस्वती (टेंबे स्वामी) स्वामी महाराज की आज्ञा अनुसार योग साधना की। भरूच में ही गुरु आज्ञा का पालन करते हुए उन्होने चातुर्मास्य किया व सवा लक्ष गायत्री जप-अनुष्ठान भी।

उनके जिवन में भगवत कृपा के अनेकों प्रसंग बने जिस के मूल मैं उनकी प.प.स्वामी महाराज पर अनन्य निष्ठा ही है। गांडा महाराज ने गालव श्रीक्षेत्र में {टेंबे स्वामी ने बताया की पुत्र प्राप्ति हेतु उनकी माताजी ने शिवरात्रि का व्रत एवं महादेव की उपासना की थी और उसके फल स्वरुप उनमें सत्त्वगुण प्राधान्य होकर यह (सद्गुरु कृपा) लाभ मिला है किन्तु व्रत उद्यापन शेष है।}द्वी दिन लघुरुद्र स्वाहाकार ( यजुर्वेद व ऋग्वेद ) महाशिवरात्रि पर उद्यापन और दूसरे दिन यथाशक्ति महाभोजन-प्रसाद कर गुरुकृपा से अपनी माताजी को ऋणमुक्त कराया। गुरुआज्ञानुसार श्रीक्षेत्र गरुडेश्वर में न रह कर उन्होंने अपने पिताजी की अन्त समय में सेवा की एवं सभी उत्तरक्रिया भी। डाकोर में कृष्णानंदसरस्वती से दंड ग्रहण कर संन्यास दीक्षा ली पश्चात उनका नाम " पू. योगानंद सरस्वती " रखा। वि.सं. १९७८ में उन्होंने अनावल स्थित शुक्लेश्वर महादेव मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया जो गुजरात में उनका आखरी मुकाम भी था। तत्पश्चात पू.श्री ने अपना सेवाकार्य क्षेत्र श्रीक्षेत्र गुंज (ता. पाथरी, महाराष्ट्र) में किया। चातुर्मास्य भी गुंज में किया। माणवत गाँव में अकाल की परिस्थिति आने पर दत्तनाम संकीर्तन पाठ करवाने पर इतनी बारिश हुई की सभी नदी-तालाब छलक गये। एक सुखे कुएँ मे अपने कमंडल जल को अभिमंत्रित कर छिडकाव करने पर नवीन जल से न केवल भर गया किन्तु तत्पश्चात वो कभी नही सुखा।

श्रीक्षेत्र गुंज में लिखे गये १५ अध्याय से आगे का लेखन कार्य शंकर कुलकर्णी (दादा साहेब) करते जैसे जैसे पू.श्री कहते। खुद गुजराती और मराठी में प्रभुत्व ठीक न होने पर अशुद्धियों को दूर करने की बात से चिंतत थे तब प.प.स्वामी महाराज का आदेश हुआ " मैं ब्रह्मचारी भेज रहा हुं चिंता मत कर ।" श्रीदत्तपुराण के १०८ पारायण  करने के बाद उद्यापन निमित्त १०८ दिन में श्रीनर्मदा परिक्रमा कर आये पू. श्री रंग अवधूत (ब्रह्मचारी) के साथ में शुद्धि कार्य पूर्ण किया।

पू. श्री रंग अवधूत महाराज ने भरूच श्री कल्याणजीभाई की मदद से भूतनाथ महादेव में रहकर ग्रंथ छपवाया। पारायण कर " श्रीगुरुमूर्ति चरित्र " से प्रेरित होकर प.प.स्वामी महाराज का संक्षिप्त चरित्र " श्रीवासुदेवनामसुधा " स्तोत्र की रचना की जिसका पू. श्री रंग अवधूत महाराज नित्य पठन करते।

प.प.वासुदेवानंद सरस्वती स्वामी महाराज के अन्य शिष्यों में पू.श्री सीताराम महाराज, पू.श्री दीक्षित स्वामी, पू.श्री गुळवणी महाराज, पू.श्री नाना महाराज, पू.श्री रंग अवधूत महाराज के नाम अत्यंत आदर से लिये जाते है। पू. श्री गांडा महाराज ने श्री गुरुमूर्तिचरित्र उपरांत ईशावास्योपनिषद पर विवेचन भी लिखा व गुजराती मे 'पुरुष धर्म निरूपण' एवं 'स्त्री धर्म निरूपण' की रचना की। 'अज्ञान तिमिर दीपक' नामक विवेचन ग्रंथ की रचना भी उन्होंने की। उनका अपने गुरुबंधु पू.श्री रंग अवधूत के प्रति अत्यंत आदर व प्रेम था। उस बात को प्रमाणित करते कई प्रसंग है। गुंज में वि. सं. १९८६ फाल्गुन कृष्ण द्वादशी के दिन समाधिस्थ हुए। त्रयोदशी के दिन विधिवत असंख्य भक्तों के बीच उनको गोदावरी नदी में जल-समाधि दी गई। 

६० वर्ष की आयु में उन्होंने दत्तभक्ति व परंपराओं के कई अनूठे कार्य किये। समाधि पूर्व गुंज में दत्त मंदिर का निर्माण करने व पालखी, नित्य-नियम  त्रिपदी करने का आदेश देते हुए आशिर्वाद भी दिया की पैसों की कभी नही होगी। उनके शिष्यों में चिंतामणी महाराज का नाम अति प्रिय है। आज गुंज में पू.श्री की समाधि तिथि व दत्त परंपरा के कई उत्सव मनाये जाते है। पू.श्री के बताएं नियमोंनुसार भजन, पालखी यात्रा की जाती है।

(पू. श्री योगानंद सरस्वती स्वामी महाराज जिवन चरित्र में से अति संक्षिप्त में।)